बिहार में बेटियों ने निभाया बेटों का फर्ज, मां की अर्थी उठाई, खुद दी मुखाग्नि
पटना। बिहार के जवैनिया गांव में सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए दो बहनों ने अपनी मां के अंतिम संस्कार की सभी रस्में स्वयं निभाईं। 20 जनवरी को लंबी बीमारी के बाद इलाज के दौरान बाबिता देवी का निधन हो गया। पिता का देहांत 18 महीने पहले हो चुका था और परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। ऐसे में बेटियां मौसमी कुमारी और रोशनी कुमारी ने न सिर्फ मां की अर्थी कंधे पर उठाई, बल्कि श्मशान में मुखाग्नि भी स्वयं दी।
ग्रामीण परंपराओं में जहां महिलाओं को अंतिम संस्कार की रस्मों से अक्सर दूर रखा जाता है। वहीं दोनों बहनों ने समाज की परवाह किए बिना पूरे साहस के साथ अंतिम यात्रा का नेतृत्व किया। आर्थिक हालात इतने खराब थे कि अंतिम संस्कार के लिए जरूरी व्यवस्थाओं को जुटाने के लिए उन्हें गांव में घर-घर जाकर मदद मांगनी पड़ी, लेकिन सहयोग सीमित ही मिला।
दिल्ली में काम करने वाली मौसमी कुमारी ने बताया कि मां के इलाज में उनकी सारी जमा-पूंजी खर्च हो गई। अब सबसे बड़ी चिंता आने वाली श्राद्ध और तेरहवीं की रस्मों को लेकर है, जिनमें खर्च के साथ-साथ परंपरागत बंदिशें भी आड़े आती हैं। इसके बावजूद दोनों बहनों का कहना है कि वे मां को अंतिम विदाई देने का अपना कर्तव्य निभाकर संतुष्ट हैं।
