उपभोक्ता आयोग का फैसला- बिल्डर हर्जाने के साथ 45 दिन में करे रजिस्ट्री

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बिल्डर की मनमानी को उपभोक्ता आयोग प्रथम ने माना सेवा में कमी

एनआईआईएल इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगाया 6.30 लाख का लगाया हर्जाना

आगरा। फ्लैट का पूरा पैसा जमा करा दिया। कब्जा भी मिल गया, लेकिन सालों टरकाने के बाद भी बिल्डर ने रजिस्ट्री नहीं की। खरीददारों ने जिला उपभोक्ता आयोग की शरण ली। आयोग ने इसे सेवा में कमी माना और एनआईआईएल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. को 45 दिनों अंदर रजिस्ट्री करने के आदेश देते हुए प्रति केस 2.10 लाख रुपये का हर्जाना भी लगाया। यह फैसला जिला उपभोक्ता आयोग प्रथम के अध्यक्ष न्यायाधीश सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह की बेंच ने सुनाया।

जिला उपभोक्ता आयोग के समक्ष सिकंदरा स्थित दि फ्लोरेंस प्लेटिनम बिल्डिंग से जुड़े तीन मामले दर्ज कराए गए। इनमें खरीदारों को फ्लैट का पूरा भुगतान करने पर कब्जा तो दे दिया, लेकिन रजिस्ट्री नहीं की जा रही थी। आयोग में दर्ज कराए मामले में डाॅ. शुचिता सिंह ने एक और डाॅ. मालिनी सिंह ने दो फ्लैट बुक कराए। पूरा पैसा जमा करने के बाद उन्हें वर्ष 2015 में कब्जा तो दे दिया गया, लेकिन रजिस्ट्री नहीं की गई। रजिस्ट्री के लिए बिल्डर लगातार टरकाता रहा। हारकर उन्होंने उपभोक्ता आयोग में मामला दर्ज कराया। आयोग ने दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की दलीलें सुनीं।

अपने बचाव में बिल्डर ने तर्क दिया कि उनका मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में लंबित है, खाते सीज हैं और मामला काफी पुराना होने के कारण समय सीमा से बाहर है। आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहाकि जब तक बिल्डर टाइटल (मालिकाना हक) ट्रांसफर नहीं करता, तब तक सेवा में कमी बनी रहती है और मामला कभी भी कालबाधित नहीं माना जा सकता। आयोग ने कहाकि एनसीएलटी में कार्यवाही चलने से उपभोक्ता के उन अधिकारों पर कोई फर्क नहीं पड़ता जो अनुबंध उल्लंघन से उत्पन्न हुए हैं। आयोग ने आदेश दिए कि कंपनी के वर्तमान निदेशक पिछले सभी विधिक और अनुबंधित दायित्वों को पूरा करने के लिए कानूनन बाध्य हैं।

आयोग ने तीनों मामलों में उपभोक्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बिल्डर को 45 दिनों के भीतर संबंधित फ्लैटों की रजिस्ट्री खरीदारों के नाम सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। साथ ही मानसिक पीड़ा और क्षतिपूर्ति के मद में प्रत्येक खरीदार को 2-2 लाख रुपये वाद व्यय के रूप में प्रति केस 10-10 हजार रुपये दिए जाने के निर्देश दिए। यदि बिल्डर निर्धारित 45 दिनों में भुगतान और रजिस्ट्री नहीं करता है, तो उसे पूरी राशि पर 9 फीसद वार्षिक ब्याज देना होगी।

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