अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते थे अजीत पवार, बारामती ने खो दिया अपना सबसे मजबूत नेतृत्व

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शपथ से लेकर चुनाव चिह्न छीनने तक के उनके किस्से महाराष्ट्र की राजनीतिक लोककथाओं का हिस्सा बने

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बेबाक और दबंग चेहरे अजित पवार का सफर बुधवार को एक विमान हादसे के साथ थम गया। उनके निधन से राज्य के सत्ता गलियारों में सन्नाटा पसरा है। अजीत पवार अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते थे और जो मन में होता था, वही जुबान पर आता था।

अजित पवार को उनके उस साहसी और विवादित फैसले के लिए हमेशा याद किया जाएगा, जब 2019 में उन्होंने सबको चैंकाते हुए देवेंद्र फडणवीस के साथ तड़के सुबह उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। हालांकि वह सरकार महज 80 घंटे चली। उनके काम करने का अंदाज शरद पवार से बिल्कुल अलग था।

अजित पवार और शरद पवार के रिश्तों में कड़वाहट की शुरुआत 2004 में हुई थी, जब अधिक सीटें होने के बावजूद शरद पवार ने मुख्यमंत्री पद कांग्रेस को दे दिया था। इसके बाद सुप्रिया सुले की राजनीति में एंट्री ने इस दरार को और गहरा कर दिया। साल 2023 में जब शरद पवार ने रोटी पलटने का बयान दिया तो अजित दादा ने ऐतिहासिक बगावत कर दी। उन्होंने न केवल पार्टी के 30 से अधिक विधायकों के साथ भाजपा-शिंदे सरकार का दामन थामा, बल्कि चुनाव आयोग में लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर एनसीपी का नाम और घड़ी चुनाव चिह्न भी अपने नाम कर लिया। इस फैसले को शरद पवार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका माना गया था।
आज जब बारामती में लैंडिंग के दौरान हुए हादसे में अजित पवार ने अंतिम सांस ली, तो उनके विरोधी भी स्तब्ध हैं। उन्होंने राजनीति हमेशा अपनी शर्तों पर की और चाचा की छाया से बाहर निकलकर अपनी एक स्वतंत्र सल्तनत खड़ी की। 2024 के विधानसभा चुनाव में महायुति की बंपर जीत में 41 सीटें जीतकर उन्होंने साबित कर दिया था कि वे महाराष्ट्र के असली दादा हैं। उनके जाने से बारामती ने अपना सबसे मजबूत नेतृत्व खो दिया है। सुबह-सुबह की शपथ से लेकर चुनाव चिह्न छीनने तक के उनके किस्से अब महाराष्ट्र की राजनीतिक लोककथाओं का हिस्सा बन गए हैं, जिन्हें सालों तक याद किया जाएगा।

 

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