मप्र के नरसिंहपुर जिले के भग्गू पहलवान हत्याकांड के 19 आरोपियों को उम्र कैद, सुप्रीम कोर्ट ने 23 साल पुराने मामले में सुनाया फैसला
आगरा के सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अजय वीर जैन ने की मामले की सशक्त पैरवी
न्यायिक व्यवस्था पर समाज का विश्वास बढ़ाने वाला मुकदमा लड़ दिलाया न्याय
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के 23 साल पुराने भग्गू कुचबंदिया उर्फ भागचंद पहलवान हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने जबलपुर हाईकोर्ट के निर्णय को पलटते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। इस मामले में 24 आरोपियों में से बचे 19 आरोपियों को आठ सप्ताह के भीतर न्यायालय के समक्ष सरेंडर करने का आदेश दिया। इस मामले में आगरा निवासी सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अजयवीर जेैन ने पैरवी की।
यह मामला 11 जुलाई 2003 का है। उस दिन मध्य प्रदेश केसरी रहे भग्गू कुच बंदिया उर्फ भागचंद पहलवान नर्मदा स्नान कर लौट रहे थे। रास्ते में आरोपियों ने उन पर लाठियों से हमला बोल दिया। हमले में भग्गू पहलवान गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया। जहां उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी। हत्याकांड के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में जबलपुर हाईकोर्ट ने आरोपियों को राहत दे दी थी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए मार्च 2026 में ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही ठहराया है और 24 आरोपियों में से बचे सभी 19 दोषियों को आठ सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया।
भागचंद अपने समय के विख्यात पहलवान थे। उनकी उपलब्धियों के लिये मप्र शासन ने मध्य प्रदेश केसरी का खिताब विभूषित किया था। इस वाद की पैरवी प्रख्यात अधिवक्ता अजय वीर सिंह एडवोकेट ने की। मूल रूप से आगरा निवासी अधिवक्ता अजयवीर सिंह ने बताया कि निश्चित रूप से यह मामला कई पेचीदगियों से भरा हुआ था। साथ ही बीस साल से अधिक पुरानी घटना है। उन्होंने कहाकि सवाल भागचंद पहलवान की हत्या करने वालों को सजा दिलवाने भर का नहीं है बििल्क न्याय व्यवस्था के प्रति समाज का विश्वास और मजबूत करना है।
इस मामले में पीड़ित भागचंद के भाई सीताराम कुचबेदिया द्वारा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर की प्रधान पीठ के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई थी। वादकारी पक्ष के अधिवक्ता अजय वीर सिंह ने बताया इस मामले में आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 147, 148, 149, 323, 325 तथा अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने सभी 19 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए आरोपियों की सजा को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (भाग-2) में परिवर्तित कर दिया था। इसके बाद पीड़ित पक्ष ने इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह अपील सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हुई। सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को को बहाल करते हुए सभी 19 आरोपियों को हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही अदालत ने सभी दोषियों को 8 सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का निर्देश भी दिया है। इस फैसले को पीड़ित परिवार के लिए न्याय की बड़ी जीत माना जा रहा है। अजय वीर सिंह आगरा के मूल निवासी हैं और सेंट पीटर्स और सेंट जॉन्स कॉलेज के छात्र रहे हैं।

