बिल्डर 45 दिनों में करे अग्रिम राशि का ब्याज सहित भुगतान
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग प्रथम आगरा का बड़ा फैसला
बिल्डर को 28 लाख का बयाना 8 फीसद ब्याज सहित लौटाने का आदेश
आगरा। शहर के एक बिल्डर को अपने ग्राहक को जमा लाखों की अग्रिम राशि को लौटाएगा। यही नहीं वह ग्राहक द्वारा जमा की गई राशि पर ब्याज का भुगतान भी अदा करेगा। इस लाखों की रकम को लौटाने के लिए बिल्डर को जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग-प्रथम ने आदेशित किया है। इसके साथ ही मानसिक पीडा और वाद व्यय का भी भुगतान करना पडेगा।
अमिता आहूजा द्वारा जिला उपभोक्ता आयोग में शस्यमंगलम इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. और दो अन्य सतीश चाहर और अतुल कुमार सिंह के विरुद्ध परिवाद दायर किया। यह परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 35 के तहत दायर किया गया था। इसके तहत परिवादिनी ने प्रतिपक्षीगण की आवासीय योजना देवश्री अपार्टमेन्ट (देव नगर कॉलोनी, आगरा) में फ्लैट संख्या 504 (क्षेत्रफल 1720 वर्ग फुट, पंचम तल) 7 जुलाई .2010 को 30 लाख की कुल कीमत पर बुक कराया था। उन्होंने पंजीकृत विक्रय करार के माध्यम से बिल्डर को 28 लाख रुपये का अग्रिम भुगतान किया था। अनुबंध शर्तों के मुताबिक बिल्डर को 12 माह की अवधि के भीतर फ्लैट का कब्जा देने और पंजीकृत बैनामा (विक्रय विलेख) निष्पादित कराना था।
परिवादिनी का आरोप था कि प्रतिपक्षीगण ने निर्धारित अवधि के अंदर न तो फ्लैट का कब्जा दिया और न ही बैनामा निष्पादित कराया। इसके बजाए, उन्होंने 7 दिसम्बर को उसी फ्लैट (संख्या 504) को किसी अन्य व्यक्ति सुरेन्द्र कुमार गुप्ता को पंजीकृत बैनामे के जरिए बेच दिया। जब परिवादिनी ने शेष धनराशि रोक ली और अग्रिम राशि वापस मांगी, तो बिल्डर ने इंकार कर दिया। परिवादनी ने 10 नवम्बर 2022 को संपर्क किया गया, तो बिल्डर ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। ’ बिल्डर ने स्वीकार किया कि 30 लाख में फ्लैट बेचने का सौदा तय हुआ था और 28 लाख बतौर बयाना प्राप्त किए गए थे। उनका दावा था कि परिवादिनी ने अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं किया और नियत समय में बकाया धनराशि 2 लाख रुपये का भुगतान करके बैनामा कराने की कार्यवाही नहीं की। इस कारण अनुबंध की शर्त संख्या 10 के अनुसार, परिवादिनी द्वारा जमा की गई 28 लाख की धनराशि जब्त कर ली गई। साथ ही 12 माह की सीमा समाप्त होने के बाद फ्लैट सुरेन्द्र गुप्ता को नियमानुसार बेच दिया गया। दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद आयोग ने परिवादिनी के पक्ष में निर्णय सुनाया और बिल्डर के तर्कों को खारिज कर दिया। आयोग ने पाया कि 12 माह की निर्धारित अवधि 6 जुलाई 2011 को समाप्त होनी थी, लेकिन बिल्डर ने इससे पहले ही, 27.जून .2011 को उक्त फ्लैट को दूसरे व्यक्ति को बेचने के लिए अनुबंध निष्पादित कर दिया।
इस आधार पर, आयोग ने माना कि बिल्डर ने स्वयं ही अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं किया और 28 लाख रुपये की अग्रिम राशि जब्त करने का प्रयास करके सेवा में कमी की है। आयोग ने माना कि वाद कालबाधित नहीं है, क्योंकि बिल्डर द्वारा भुगतान में टाल-मटोल किया गया, चेक अनादरित (बाउंस) हुए और अंतिम बार 10 नवम्बर 2022 को भुगतान करने से इंकार किया गया। इसलिए वाद का कारण निरंतर जारी रहा। आयोग ने प्रतिपक्षीगण को आदेश दिए 45 दिन के भीतर जमा की गई 28 लाख रुपये 7 जुलाई 2010 से 8ः वार्षिक साधारण ब्याज परिवादिनी को वापस किए जाने के आदेश किए। इसके अलावा विक्रय अनुबंध पत्र के लिए अदा की गई 60 हजार रुपये की राशि पर भी 7 जुलाई 2010 से 8 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज लगाकर लौटाने के साथ ही मानसिक पीड़ा क्षतिपूति के रूप में एक लाख रुपये और वाद व्यय के रूप में 20 हजार का हर्जाना भी लगाया। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिए कि अगर बिल्डर 45 दिनों के भीतर भुगतान नहीं करते हैं, तो उन्हें सम्पूर्ण धनराशि पर 8 के बजाय 12 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देना होगी।
